
पंडित सर्विंद दीक्षित ने बताया पांचों पर्वों का धार्मिक महत्व एव पूजा-विधि
गाजियाबाद। सनातन धर्म में दीपावली केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि धन, आरोग्य, सुख-समृद्धि, प्रकाश, प्रकृति संरक्षण और पारिवारिक संबंधों को समर्पित पर्वों की एक विशेष श्रृंखला है। इस वर्ष दीपावली पर्वों की शुरुआत 6 नवंबर, शुक्रवार को धनतेरस से होगी। इसके बाद 7 नवंबर को छोटी दीपावली, 8 नवंबर रविवार को मुख्य दीपावली एवं लक्ष्मी पूजन, 9 नवंबर को अमावस्या का दिन तथा 10 नवंबर मंगलवार को गोवर्धन पूजा और 11 नवंबर बुधवार को भाई दूज का पर्व मनाया जाएगा।
पंडित सर्विंद दीक्षित ने बताया कि प्रत्येक पर्व का अपना विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है।
धनतेरस (6 नवंबर, शुक्रवार): धनतेरस को धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन के समय अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस दिन घरों में साफ-सफाई कर संध्या के समय दीपक जलाना चाहिए। भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर की पूजा कर आरोग्य एवं समृद्धि की कामना करनी चाहिए। परंपरा के अनुसार सोना, चांदी, बर्तन अथवा अन्य शुभ वस्तुओं की खरीदारी भी की जाती है।
छोटी दीपावली (7 नवंबर, शनिवार): इसे रूप चतुर्दशी और नरक चतुर्दशी से जुड़ा पर्व भी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी अवसर पर नरकासुर का वध कर लोगों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इस दिन प्रातःकाल अभ्यंग स्नान, शरीर पर तेल लगाना, घर की साफ-सफाई और संध्या समय यमदीप जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि यमदेव के निमित्त दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
बड़ी दीपावली (8 नवंबर, रविवार): कार्तिक अमावस्या को मनाया जाने वाला दीपावली का मुख्य पर्व भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी से जुड़ा है। इस दिन घरों और प्रतिष्ठानों को दीपों एवं रोशनी से सजाया जाता है। संध्या के समय शुभ मुहूर्त में भगवान गणेश, माता लक्ष्मी एवं मां सरस्वती की पूजा की जाती है। पूजा में पुष्प, फल, मिठाई, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, बुद्धि एवं उन्नति की कामना की जाती है। व्यापारी वर्ग अपने प्रतिष्ठानों में बही-खातों एवं धन की पूजा भी करता है।
9 नवंबर, सोमवार (अमावस्या): इस दिन भी धार्मिक परंपरा के अनुसार दीपदान, ईश्वर स्मरण और पूजा-पाठ का विशेष महत्व है। इसे मुख्य दीपावली एवं गोवर्धन पूजा के बीच का दिन माना जा रहा है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक एवं क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं।
गोवर्धन पूजा (10 नवंबर, मंगलवार): इस दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करने की स्मृति में गोवर्धन पूजा की जाती है। घरों में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसकी पूजा की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। विभिन्न प्रकार के पकवान एवं सब्जियों का भोग लगाकर प्रसाद वितरित किया जाता है। इस पर्व का संदेश प्रकृति, गौवंश और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी है।
भाई दूज (11 नवंबर, बुधवार): दीपावली पर्व श्रृंखला का समापन भाई दूज के साथ होता है। यह भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और अटूट विश्वास का पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य एवं सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। भाई अपनी बहनों को उपहार देकर उनकी रक्षा एवं सम्मान का संकल्प लेते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे, तभी से भाई दूज मनाने की परंपरा चली आ रही है।
पंडित सर्विंद दीक्षित ने सभी श्रद्धालुओं से अपील की कि सभी पर्वों को श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाएं। दीपावली पर मिट्टी के दीपकों को प्राथमिकता दें, पर्यावरण को स्वच्छ रखें, अनावश्यक पटाखों से बचें तथा जरूरतमंदों के साथ खुशियां बांटें। त्योहारों का वास्तविक उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि परिवार, समाज और प्रकृति के साथ प्रेम, सद्भाव एवं सकारात्मकता को बढ़ावा देना है।
