
गाजियाबाद। सनातन धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व माना गया है। इस वर्ष पितृ पक्ष शनिवार, 26 सितंबर से प्रारंभ होकर शनिवार, 10 अक्टूबर को संपन्न होगा। इन दिनों में श्रद्धालु अपने दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और उनकी आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण एवं दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्य करते हैं।
पंडित सरविंद दीक्षित ने कहा कि ‘श्राद्ध’ केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। आज हम जीवन में जो कुछ भी प्राप्त कर पाए हैं, उसमें हमारे माता-पिता, दादा-दादी और उनसे पहले की पीढ़ियों के त्याग, परिश्रम और संस्कारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पितृ पक्ष हमें अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर देता है।
उन्होंने कहा कि पितृ पक्ष में अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण को भोजन कराना, जरूरतमंदों को अन्न एवं वस्त्र का दान करना तथा सेवा कार्य करना पुण्यदायी माना गया है। यदि किसी कारणवश ब्राह्मण को भोजन कराना संभव न हो तो किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराया जा सकता है। धार्मिक आस्था रखने वाला व्यक्ति यदि आर्थिक रूप से दान करने में सक्षम न हो, तो भी वह अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए भगवान सूर्य को श्रद्धापूर्वक जल अर्पित कर सकता है।
पंडित दीक्षित ने कहा कि पितरों को प्रसन्न करने के लिए सबसे आवश्यक है कि हम अपने जीवन में अच्छे कर्म करें, जरूरतमंदों की सहायता करें और परिवार में संस्कारों एवं सद्भाव को बनाए रखें। पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल किसी एक दिन तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके बताए अच्छे संस्कारों को अपने आचरण में उतारना ही उनके प्रति वास्तविक सम्मान है।
उन्होंने बताया कि पितृ पक्ष के दौरान गौ सेवा, पक्षियों एवं जलचर जीवों को अन्न खिलाने जैसी सेवा परंपराओं का भी विशेष महत्व है। अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गाय को रोटी खिलाना, मछलियों को आटा या दाना देना तथा जरूरतमंदों को भोजन कराना पुण्य कार्य माना गया है।
पंडित सरविंद दीक्षित ने कहा कि इस बार पितृ पक्ष का आरंभ और समापन दोनों शनिवार को हो रहा है। धार्मिक मान्यताओं में श्राद्ध देव को वैवस्वत मनु के रूप में भी जाना जाता है और उन्हें सूर्य देव की पत्नी संज्ञा का पुत्र माना गया है, जबकि शनिदेव सूर्य देव की पत्नी छाया के पुत्र हैं। इस दृष्टि से दोनों को भाई माना जाता है।
उन्होंने कहा कि पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धा, संयम, सेवा और सद्कर्म का पालन करते हुए अपने पूर्वजों को याद करना चाहिए। पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भाव हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी संस्कार और परिवार की जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है।
