
गाजियाबाद : नगर निगम के चुनाव सिर पर है सबसे अधिक मारामारी भाजपा में टिकट को लेकर हो रही है मेयर का टिकट वैसे तो प्रदेश स्तर से तय होगा परंतु वैश्य समाज की सीट मानी जाने वाली मेयर सीट पर भी गोलमाल चल रहा है इस सीट को भी अन्य जाति को देने की मंशा बनाई जा रहीं है पर पार्षद के टिकट स्थानीय नेता ही तय करके 3 नामों का पैनल बनाकर भेजेंगे और लगभग वही नाम फाइनल होंगे जो पैनल में प्रथम स्थान पर होंगे
पिछले नगर निगम चुनाव में सिर्फ नाम मात्र के पार्षद टिकट देकर वैश्य समाज को ठंडा कर दिया गया था, गाजियाबाद नगर निगम चुनाव हेतु 100 वार्डो में सबसे कम टिकट वैश्य समाज को मिले थे शहर विधान सभा क्षेत्र में क्षेत्र के 33 वार्डो में से 1 वार्ड में वैश्य प्रत्याशी का नाम माडल टाउन / कोट गांव क्षेत्र से लगभग तय हो गया था उसे भी एक बड़े नेता जी ने अपनी विधान सभा क्षेत्र में ही कटवा दिया सिर्फ 1 ही वैश्य प्रत्याशी बनाया गया और वो जीते भी परंतु वैश्य समाज को मन मसोस कर सिर्फ इतने से ही संतोष करना पड़ा था।
कई वार्ड तो ऐसे भी है जो की सामान्य जाति के लिए आरक्षित है परंतु अपने चहेते को टिकिट देने के चक्कर में महिला/ अन्य जाति या आरक्षित वर्ग के व्यक्ति को भी गंभीर प्रत्याशी बताया जा रहा है जबकि उन तथाकथित गंभीर प्रत्याशियों की जितने की संभावना नगण्य है परंतु नेता परिक्रमा के कारण वो सामान्य सीट पर अन्य व्यक्ति भी टिकटार्थी हो सकते है।
इस बार भी सिर्फ कुछ ही वैश्य समाज के लोग टिकट मांग रहे है परंतु लगता है की कहानी तो पुरानी ही दोहराई जायेगी 100 वार्डो में से शायद बमुश्किल कुछ ही लोगों को भाजपा से प्रत्याशी बनाए जाए और वैश्य समाज फिर से ठगा जाए । शहर विधायक जो की वैश्य समाज के नाम पर ही टिकट पाते है और वैश्य समाज उन्हें सिर आंखों पर बिठाता है वो वैश्य समाज के हित की कितनी लड़ाई लड़ेंगे ये देखना दिलचस्प होगा।
गाजियाबाद को वैश्य समाज की सीट माना जाता है यहां चुनावी हार जीत वैश्य समाज ही तय करता है फिर भी वैश्य समाज हर बार धोखा खाता है इसीलिए जब वैश्य समाज ने एक बार अंगड़ाई ली तो सुरेंद्र गोयल को विधायक और सांसद बनाया, बसपा का न के बराबर जनाधार होने पर भी वैश्य समाज के कारण सुरेश बंसल विधायक बने, अतुल गर्ग विधायक जीते, दिनेश गोयल विधायक बने, पर अब पुनः उस प्रकार से नाक की बात बना लेने के लिए फिर से वो जोश, वो उत्साह, वैश्य समाज के लिए समर्पण को साबित करने के लिए वैश्य समाज को फिर से अंगड़ाई लेनी होगी यदि भविष्य में वैश्य समाज को राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करनी है तो चाहे किसी भी दल से वैश्य प्रत्याशी बनाया जाए उसे जिताना होगा। समाज ने यदि ठान लिया और पूर्व इतिहास दोहराने की कसम खा ली तो किसी भी राजनीतिक दल को वैश्य समाज को नजर अंदाज करना महंगा पड़ सकता है ।
