
भाजपा द्वारा गाजियाबाद से मेयर के लिए सुनीता दयाल को प्रत्याशी बनाया गया है जो कि वर्तमान में भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष है और काफी लंबे समय से भाजपा से जुड़ी हुई है
वैसे तो सुनीता दयाल को पुरानी कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता है पर उनकी खुद की पकड़ गाजियाबाद के कार्यकर्ताओं पर नही है पूर्व में जब सुनीता दयाल विधायक का चुनाव लड़ी थी तो इनके खुद के व्यवहार के कारण कार्यकर्ताओं ने साथ नहीं दिया संगठन के हर प्रकार से प्रयास करने बाद भी सुनीता दयाल चुनाव हार गई थी। गाजियाबाद का ये माहौल है की यहां से भाजपा किसी को भी प्रत्याशी बना दे उसकी जीत निश्चित मान ली जाती है पर इस बार के चुनाव में जीत के लिए सुनीता दयाल को बहुत ही संयमित व्यवहार रखना होगा कार्यकर्ताओं से निरंतर संवाद करने के साथ ही उनका सम्मान भी प्राथमिकता पर रखना होगा।
वैश्य समाज की सुनीता दयाल को यूं ही टिकिट नही मिल गया बल्कि सोची समझी राजनीति है, इसे 2024 के लोक सभा चुनाव से जोड़कर यदि समझे तो यहां से राज्य सभा सांसद इस बार लोक सभा चुनाव की तैयारी कर रहे है जिसे वर्तमान सांसद पचा नहीं पा रहे ऐसे में मेयर प्रत्याशी वैश्य समाज से बनाकर सांसद के टिकिट के लिए वैश्य समाज के दावे को कमजोर किया गया है
वैश्य समाज वैसे तो गाजियाबाद के चुनावों में हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है परंतु आज भी संगठित नहीं है अनेकों वैश्य समाज के संस्था होने के कारण कोई कहीं तो कोई कहीं जुड़ा है कोई एक सर्वमान्य नेता नही है आगे पीछे सब एक दूसरे का विरोध करते है जिसका फायदा अन्य जाति के नेता उठा ले जाते है ऐसे में इस बार ये देखना दिलचस्प होगा कि वैश्य समाज कितने उत्साह से सुनीता दयाल को चुनाव लड़वाता है या उनका व्यवहार इस बार भी उनकी राहें मुश्किल करेगा।
